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कवि डॉ ब्रम्हानन्द तिवारी ‘अवधूत’ का एक प्रणय गीत..मेरी कश्ती किनारे पर लगा दो फिर चले जाना

डॉ ब्रम्हानन्द तिवारी ‘अवधूत ‘
मैनपुरी, उत्तर प्रदेश
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गीत
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चले हो तुम कहाँ हमदम मेरे इतना बता जाना।
मेरी कश्ती किनारे पर लगा दो फिर चले जाना।।

रहेगी ख्वाब बनकर जिन्दगी तुम बिन ओ जानेमन,
मेरी आँखों से बरसेगी मोहब्बत अश्क बन हमदम,
मेरे अश्कों के दरिया में नहा लो फिर चले जाना।
चले हो तुम कहाँ हमदम मेरे इतनाबता जाना।।

तमन्ना भी अधूरी है मुहब्बत भी अधूरी है,
जो मिलनें भी नहीं देती सनम वो कैसी दूरी है,
मुझे एक बार बाहों में उठा लो फिर चले जाना
मेरी कश्ती किनारे पर लगा दो फिर चले जाना।।

कहा था तुमनें ये दामन पकड़कर हम न छोड़ेंगे,
रहेंगे साथ मिलकर हम कभी भी मुंह न मोड़ेंगे,
अभी यौवन है ब्रम्हानन्द गुजरे तब चले जाना।।
चले हो तुम कहाँ हम दम मेरे इतना बता जाना।।

मेरी आँखों में देखो ये घटा सावन की छाई है,
बरसतीं हैं मेरी आँखेँ दया तुमको न आई है,
बरसती आग सावन में बुझा दो फिर चले जाना।
चले हो तुम कहाँ हमदम मेरे इतना बता जाना।।
मेरी कश्ती किनारे पर लगादो फिर चले जाना।।

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