कवि सुरेश स्नेही की केदारनाथ आपदा पर एक गढ़वाली कविता
सुरेश स्नेही
सुपाणा चौरास, टिहरी गढ़वाल
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केदारनाथ आपदा (१६/१७ जून २०१३)
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हे विधाता तु किलै ह्वे तै दिन काखा,
अर किलै बुजिन तिन तै दिन आंखा,
तेरा दर्शनुक आणा छा जु भग्त,
तिन ऊॅकू ध्यान किलै नि राख्या,
हे विधाता तु किलै ह्वे तै दिन काखा।
२०१३ कू १६/१७ जून कू दिन छाई,
भग्तु का ळैंजा तेरा द्वार पर औणु लग्यां छाई,
क्वी अद्बाट्टों त क्वी तेरि डेळि मां पौछि छाई,
तबैर्यू कुजाणि कख बटि पाणिकु भ्यृूंचाल आइ,
सैरि केदार धरति थर-थर थतरै ग्याइ, तिन कैबि धै नि लगाइ,
तु कुजाणि कख सुनिंद सेयूं राई,
तेरा भग्त वख बिबताणा छाई,
पराण कण्ठ ऐगे छा ऊॅका,
हे विधाता तु किलै ह्वे तै दिन काखा।
बरखा घनाघोर, चुकपट अन्धेरू ओर-पोर,
चिल्लाट अर रूवारू मचि रै होळि वख सबु कि,
क्वी भागणा, अर क्वी बगणा,
श्रद्धा भगति बि काम नि ऐ ऊॅकि,
क्वी दबी गैनी, त क्वी बगदि रैनि,
पर त्वे दया नि ऐ कैकि,
तु कुजाणी भांगलु पेकि कख सेई रैई,
अपणा भग्तुकि जु तिन सुद विसरैई,
जरासि तु तबरि जु बिजि जान्दि,
त कथग्युं कि जान आज बचि रान्दि,
अन्धेरा अर पाणि का भ्यूंचला मा
ह्वे होळु ऊॅकु उकताटा,
हे विधाता तु किळै ह्वे तै दिन काखा।
जु घौर बौडिकि नि गैनी,
ऊॅका खोजदारा यख ऐनि,
खोजदारौंन कैकि लत्ति-कपडि,
त कैकि गौणि पाति पैनि,
देखिक हाल यखका खोजदारा बि रोन्दि रैनि,
रोन्दु-रोन्दु सी फुण्ड अपड़ा घौरू गैनि,
बाटा-घाटा यख सब टुटी गैनि,
क्वी जंगलु अर क्वी उड्यारू मा फंस्या रैनि
कथग्यूंन त औणुकु वाटा अर खाणुकु अन्न निपै,
उ विचारा त बचिकि बि मोरि गैनि,
सरकारन सब्बु तैं ढांडस देई,
पुलिस अर फौज रैसक्यु मा लगैई,
जू बचिगिन ऊन दूणू जनम पैई,
टीवी रेडियो अर अखबारू मां बस यै खबर छपणी रैई,
पर तेरा चुपचाप बुज्यां रैनी आंखा,
हे विधाता तु किलै ह्वे तै दिन काखा।।
©® सुरेश स्नेही
सुपाणा चौरास, टिहरी गढ़वाल
हाल निवास – देहरादून।
