प्रतिभा की कलम से… हम तेरी गलियों में “मौसम” के बहाने आएंगे
प्रतिभा की कलम से
देहरादून, उत्तराखंड
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स्थापित हो जाने या एक मुकाम हासिल कर लेने के बाद अक्सर अदाकार यह कहते हुए सुने जाते हैं कि फलां निर्देशक ने हमें वह बनाया, जो आज हम हैं। लेकिन, संजीव कुमार के बारे में मेरा ऐसा मानना है कि सार्थक सिनेमा के सबसे करीबी निर्देशक उनके दोस्त गुलज़ार साहब का नाम सही मायनों में गुलज़ार किया संजीव कुमार की अभिनय क्षमता के विभिन्न आयामों ने।


संजीव कुमार और गुलज़ार साहब की जोड़ी ने करीब बारह हिट फिल्में दी हैं। ‘नमकीन’ का गेरूलाल वहीदा रहमान, शर्मिला टैगोर, शबाना आज़मी के बीच किराएदार होकर भी सबके मन का मकान-मालिक ही नहीं बन बैठता है, बल्कि अपनी अदाकारी से दर्शकों का दिल भी जीत लेता है और इस तरह ‘नमकीन’ हिंदी सिनेमा के इतिहास में यथार्थ मनोरंजन के एक नये स्वाद के तौर पर दर्ज़ हो जाती है।
‘परिचय’ में जया भादुड़ी और नौजवान जितेंद्र की खुशनुमा उपस्थिति के बीच भी उदास, बीमार किंतु गुणी संगीतज्ञ पिता का सशक्त परिचय देने में भी पूरी तरह से कामयाब रहे संजीव कुमार। ‘कोशिश’ के हरिचरण माथुर ने अपनी आंखों और चेहरे के हावभाव की सहायता मात्र से ही गूंगे-बहरे व्यक्ति का ऐसा जीवंत अभिनय प्रस्तुत किया कि इस फिल्म के लिए उन्हें दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

‘आंधी’ में इंदिरा गांधी की सी छवि लिए पूरी फिल्म पर हावी हैं सुचित्रा सेन। लेकिन, उनके परित्यक्त पति के रूप में भी जैसे संजीव कुमार को ही अपना बना रखा हो दर्शकों ने। हमेशा संजीदा ही क्यों! संजीव कुमार हंसाते भी थे। किशोर कुमार जैसे महान हास्य अभिनेता जो काम न कर सके, वो ‘अंगूर’ में संजीव कुमार ने कर दिखाया। किशोर कुमार के डबल रोल वाली इस कहानी पर पहले भी फिल्म बनी थी, लेकिन पिट गई। संजीव कुमार ने एक बार जब गुलज़ार साहब से शिकायत की, कि यार तुम मुझे हर फिल्म में बूढ़ा ही दिखाते हो, जवान कब दिखाओगे?
तब उन्होंने अंगूर फिल्म के अशोक के किरदार में संजीव को उनकी वास्तविक उम्र का दिखाया। संजीदा और हास्य दोनों भूमिकाओं में संजीव फिर भी ‘बड़े’ ही साबित हुए।
गुलज़ार साहब से पहले संवेदनशील फिल्मों का एक और बड़ा नाम हुए हैं ऋषिकेश मुखर्जी। फिल्मी सफर के शुरूआत में संजीव कुमार का रोल उनकी फिल्मों में जरा छोटा-छोटा सा हुआ करता था, जैसे ‘सत्यकाम’ और ‘आशीर्वाद’ में। लेकिन, भूल जाने या अनदेखा करने जैसा यह फिर भी न हुआ। ‘सत्यकाम’ धर्मेंद्र और ‘आशीर्वाद’ पूरी तरह से अशोक कुमार की फिल्म है, फिर भी संजीव कुमार याद रह जाते हैं अपने सहज अभिनय और मोहक मुस्कान के दम पर।
हां ! ‘अर्जुन पंडित’ में जरूर ऋषिकेश मुखर्जी ने उन्हें विस्तार दिया तो उन्होंने भी ख़ुद को साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इसके अलावा ‘अनुभव’ और ‘गृह प्रवेश’ में बासु भट्टाचार्य, ‘पति-पत्नी और वो’ में बीआर चोपड़ा, ‘सिलसिला’, ‘त्रिशूल’ में यश चोपड़ा जैसे दिग्गज निर्देशकों पर भी संजीव कुमार साहब का एहसान है कि उन्होंने उनकी फिल्में साइन की।
शोले के निर्देशक रमेश सिप्पी का नाम एकबारगी लोग भूल भी जाएं। लेकिन, ठाकुर साहब को कोई भूल सकता है भला? असली शोले तो उन्हीं की संवाद अदायगी ने भड़काए थे पर्दे पर। फिल्म “जानी दुश्मन” में विनोद मेहरा, शत्रुघ्न सिन्हा, नीतू सिंह, रीना रॉय, सुनील दत्त, बिंदिया गोस्वामी, रेखा, सारिका, योगिता बाली जैसे बड़े कलाकारों की रंगीन भीड़ के बावजूद भी बाजी मार ले गया रहस्य और रोमांच से भरपूर संजीव कुमार साहब का दुल्हनों की डोली लूटने वाला ठाकुर का रोल।
“मौसम” फिल्म के डॉक्टर अमरनाथ की भूमिका में एक भली लड़की कजरी को वेश्यावृत्ति के धंधे से बाहर निकाल कर मुख्यधारा में लाने की कामयाब कोशिश कागज़ी पन्नों पर किसी को भी विचलित कर सकती है। लेकिन, फिल्म के माध्यम से इस संवेदनशील विषय को सहज प्रश्न बना कर मन में खड़ा कर देना आसान नहीं है। गुलज़ार की अभिनव कल्पनाशीलता को नया आयाम मिलता है संजीव कुमार की ग्राह्य और स्पर्शी अभिनय की सहज समझ से।
फिल्मी पर्दे पर ऐसे मौसम बार-बार नहीं आते। कोठे से खरीद कर लाई लड़की को बेटी की तरह अपना लेने वाले व्यवहार से चकित कजरी भी तो यही पूछती है संजीव कुमार से- ‘तुम दूसरे टाइप के आदमी हो’😀? और वो बड़ी सहजता से हां में सिर हिला देते हैं तो यक़ीनन वह सही थे क्योंकि जो एक ही फिल्म में नौ किरदारों को सफलतापूर्वक जी सके, इस टाइप का कलाकार तो आज तक इंडस्ट्री में कोई पैदा हुआ नहीं। “नया दिन नई रात” फिल्म में उन्होंने नौ रसों पर आधारित नौ अलग-अलग रोल निभाये थे।
महान फिल्मकार सत्यजीत रे के साथ उन्होंने “शतरंज के खिलाड़ी” में मिर्ज़ा सज्जाद अली का यादगार रोल किया। इसके अलावा “सीता और गीता”, “खिलौना”, “मनचली”, “अनामिका”, “दस्तक”, “देवी”, “नौकर”, “अपनापन”, “सूरज और चंदा”, “ईगल”, “जिंदगी”, “आप की कसम”, “हीरो”, “विधाता”, “कत्ल”..जैसी डेढ़ सौ से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया। रोल छोटा है या बड़ा! इस बात की चिंता किए बिना अदाकारी के विविध रंगों से संजीव कुमार हर भूमिका को इंद्रधनुषी विस्तार दे देते थे। अपने किरदारों में दर्शकों के मनमाफ़िक पूर्णता न ला पाने का मलाल कभी न कभी हर कलाकार के हिस्से में आता है। लेकिन, संजीव कुमार हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर का वो नाम जो हर किरदार में संपूर्ण और वास्तविक!
