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कवि सतीश बंसल की कुछ छंद

सतीश बंसल
देहरादून, उत्तराखंड


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नफ़रत की विद्वेष की, भड़काने को आग
उगल रहे विष रात दिन, मानव रूपी नाग
मानव रूपी नाग, ओढ़ धर्मो के चोले
घोल रहे है ज़हर, सोच में हौले हौले
कह बंसल कविराय, चुकाएंगे सब कीमत
कुंठा यदि हो गयी, सफ़ल फ़ैलाकर नफ़रत।।

रब ईसा मौला कहो, ख़ुदा कहो या राम
जगत नियंता एक है, अलग अलग हैं नाम
अलग अलग हैं नाम, अलग पूजा विधान है
लेकिन वो हर रंग, रूप में विद्यमान है
कह बंसल कविराय, उसी के वंशज हम सब
कहो उसे अल्लाह, राम चाहे बोलो रब।।

ग्रंथों में उल्लेख है, कहते हैं सब संत
क्षण भंगुर है झूठ की, सच की उम्र अनंत
सच की उम्र अनंत, अमर है इसका वैभव
जिसने साधा सत्य, उसे कुछ नही असंभव
कह बंसल कविराय, उलझिये मत पंथों‌ में
मानवता है श्रेष्ठ , लिखा है सब ग्रंथों में।।

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