विश्व प्रकृति दिवस: पक्षियों की उड़ान बिन सूने आसमान के साये में क्या होगी हमारी प्रकृति
प्रतिभा की कलम से
देहरादून, उत्तराखंड

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आज विश्व प्रकृति दिवस है। हमें बात करनी पड़ेगी पर्यावरण की, प्रकृति में मौजूद छोटे-बड़े पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं के संरक्षण की। पहला ध्यान जाता है, बड़ी काया वाले वृक्षों जैसे पीपल और बरगद के बारे में। खूब सारे पक्षियों का आशियाना हो या फिर ऑक्सीजन का अकूत भंडार, बहुत सारे आयुर्वेदिक उपयोग हों या गर्मियों में ठंडी हवा के साथ घनी छाया देते इन वृक्षों की उत्पत्ति के बारे में सोचा है हमने?
कभी सुना था कि कौवे की बीट से पीपल और बरगद के पौधे उपजते हैं। जड़ों का फैलाव बहुत अधिक होने के कारण अपने घर के आस-पास तो लोग इन्हें लगाते नहीं लेकिन, छत पर पानी की टंकियों की सतह पर जब ये जम जाएं तो इन्हें उखाड़ने की हिम्मत कोई आसानी से कर नहीं पाता। कारण है पितरों की नाराजगी। कई जगह मान्यता है कि व्यक्ति के अंतिम संस्कार के बाद उसकी अस्थियों को घर लाने के बजाय पीपल के वृक्ष पर लटका देना चाहिए।
पितरों के वास की इसी अधिमान्य भावना के भववश पीपल के पत्तों को नुकसान पहुंचाने से हर कोई डरता है। तब कौओं का क्या, जिनके लिए पितृपक्ष में नियमित रूप से खीर-पूरी मुंडेरों पर रखकर हम भूलते जा रहे हैं कि कोई इन्हें जीमने आया भी या नहीं? किसी जमाने में मेहमानों के आने का शुभ संकेत देती कव्वे की कांव-कांव अब कहां? खेतों की उपज बढ़ाने के उद्देश्य से उर्वरक और कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग व जगह-जगह बिछते मोबाइल टावरों के रेडिएशन से कौवे अब लगभग समाप्ति की ओर हैं।
सोचिए जरा! जिनकी बीट पर टिका है पीपल, बरगद जैसे अनेक छोटे-बड़े वृक्षों का अस्तित्व/उन पक्षियों की उड़ान बिन सूने आसमान के साये में क्या होगी हमारी प्रकृति?
