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वरिष्ठ कवि शा इर जीके पिपिल की ग़ज़ल … जिसे चाटकर वो बन बैठा दल में फ़िर से ख़ास रे…

जीके पिपिल
देहरादून, उत्तराखंड


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गज़ल

उसे सोनिया के तलवों में गुड़ सी मिली मिठास रे
जिसे चाटकर वो बन बैठा दल में फ़िर से ख़ास रे।

परिवर्तन ही मंत्र है उसका दिल का हो या दल में
एक ही दल में जमकर रहना आये उसे ना रास रे।

और नहीं कुछ चाहिये उसको जन सेवा के बदले
मिलें मुफ़्त में राशन, बिजली और बड़ा आवास रे।

आँख है उसकी सीएम पद पर दूर बहुत है उससे
जोड़ तोड़ में लगा हुआ है यही है उसकी प्यास रे।

कौन सा दल उपयोगी होगा क्षेत्र कौन सा बेहतर
लग जाता है चुनाव पूर्व ही उसे इसका आभास रे।

लोग भले ही उसे आज भी शक़ की नज़र से देखें
लेकिन उसको आज भी खुद पर पूरा है विश्वास रे।।

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