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वरिष्ठ कवि जीके पिपिल की एक शानदार ग़ज़ल … फलों को हाथों से नहीं पत्थरों से तोड़ा गया

जीके पिपिल
देहरादून, उत्तराखंड


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ग़ज़ल

फलों को हाथों से नहीं पत्थरों से तोड़ा गया
जैसे दिल के फफोलों को सुईं से फोड़ा गया।

अश्क़ों की एक बूंद तक ना बच सकी बाकी
तन्हाई में आँखों को इस क़दर निचोड़ा गया।

क्या बतलायें कि जिन्दगी को जिया है कैसे
समझ लो जिंदा रहते हुये क़फ़न ओढ़ा गया।

इंसानियत का तक़ाज़ा नहीं तो और क्या था
जब हाथ में आये शिकार को भी छोड़ा गया।

फ़ैसला पहले से हो चुका था हमारे खिलाफ़
इसलिये तो गवाह को भी तोड़ा मरोड़ा गया।

ना जाने ऐसा किसके इशारों पर किया गया
जिस तरफ़ मौत थी कारवाँ उधर मोड़ा गया।

मोहब्बत का अंजाम सब लोग जानते तो हैं
मोहब्बत में जग से अकेला नहीं जोड़ा गया।

उसके इलाज़ से बस इतनी शफ़ा हुई है मुझे
उसके मरहमों से ज़ख्म नहीं दर्द थोड़ा गया।

कमाल है भीड़ में फिर कोई घायल ना हुआ
कमान से तीर को कुछ इस तरह छोड़ा गया।।

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