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वरिष्ठ कवि जीके पिपिल की एक गज़ल.. हम ख़ुद को बेचकर अपने घर मेहमान ले आये

जीके पिपिल
देहरादून, उत्तराखंड

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गज़ल

हम ख़ुद को बेचकर अपने घर मेहमान ले आये
इबादत को कुछ धूपबत्ती थोड़ा लोबान ले आये।

फूलों का क्या है उन्हें तो फ़िर से सजा सकते हैं
ये क्या कम है बचाकर अपना गुलदान ले आये।

ख़ुदा उन लोगों से कुछ ज़्यादा मुतास्सिर हुये हैं
जो अपने घर क़ुरान और उस पे ईमान ले आये।

हमारी आस्था और विश्वास पर शक़ मत करना
हम घरों में ही नहीं दिल में भी भगवान ले आये।

उसके तन की खुशबू को सूँघकर लगता है ऐसे
जैसे खुशबू के फूल नहीं उनकी दुकान ले आये।

क़ातिल बहुत चालाक था मक़तल को धो दिया
हम चाकू पर उसकी उँगली के निशान ले आये।

उन्होंने जब सुना कि आसमान बादल का घर है
तो मरुस्थल भी अपने सर पे आसमान ले आये।

जैसे ही भनक लगी कि दीवाली पर दीये जलेंगे
क़बीले के कुछ लोग पड़ोसी से तूफ़ान ले आये।

कुछ मुट्ठी भर लोगों की सोच का परिणाम है ये
जो जीवन की ज़मीन में भी क़ब्रिस्तान ले आये।

वो लोग कभी भी खुशहाल ज़िंदगी ना जी सके
जो भूलों से भी प्यार में नफ़ा नुकसान ले आये।

ये सावित्री के प्रेम की पराकाष्ठा नहीं तो क्या है
जो श्रवणकुमार के तन में वापस जान ले आये।

हमें ख़रीद फ़रोख्त का फ़न तो जैसे आया नहीं
हम अपने शेरों के बदले उनका दीवान ले आये।

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